मुक्तिका: .....डरे रहे. --संजीव 'सलिल'
मुक्तिका .....डरे रहे. संजीव 'सलिल' * हम डरे-डरे रहे. तुम डरे-डरे रहे. दूरियों को दूर कर निडर हुए, खरे रहे. हौसलों के वृक्ष पा लगन-जल हरे रहे. रिक्त हुए जोड़कर बाँटकर भरे रहे. नष्ट हुए व्यर्थ वे जो महज धरे रहे. निज हितों में लीन जो समझिये मरे रहे. सार्थक...
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दिव्य नर्मदा divya narmada
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[30 May 2010 06:02 AM]



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