जा उद्धो जा... मत कर जिरह..
हे उद्धो ...मत जिरह करोउस छलिया कीजिसने भ्रमर रूप रख हम संग प्रीत बढाईऔर अब हमारी हर रात परपत्थर फैंक कर जाता है ...मन को जख्मी करता है ..हमारे अंतस पर उसी का पहरा है.द्रगंचल परजाले बुन दिए हैं ..अपनी लीलाओ के उसने. .हमारे वजूद कीअट्टालिका सेवो हठी उतरता...
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अनामिका की सदाये......
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[30 May 2010 02:18 AM]



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