बरखा गीत
दूत बनाकर बादलों कोमैं लिखूँ पाती कोईमेघमय आकाश साराआच्छन्न है हरीतिमा परहौले से आकर गालों परटकराती है बूँद कोईतनमन सिहर सा जातामन कहता है स्वयं सेदूत बनाकर बादलों को मैं लिखूँ पाती कोईरोम-रोम पुलक उठतामात्र जिसके स्मरण सेबह चली है मधुर गति सेअल्हड़-सी...
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डॉ. राजेश नीरव
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[30 May 2010 01:30 AM]



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