निःशब्द
चलती हवा में झूमते पेड़ की खुशी का गीत मुझॆ पढ़ने नहीं आता ! तुम्हारे शब्द भी कहां पढ़ पाता हूं ! ! ! बसन्ती बयार में मचलती चिड़िया की चहकन मुझे लिखने नहीं आती ! तुम्हारी हंसी भी कहां लिख पाता हूं ! ! ! पहली फुहार में तर बतर भीजतें पलाश की बूंद बूंद खुशी...
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आर्जव
कविता
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[29 May 2010 14:42 PM]



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