रिश्ते भी देह बदलते हैं...

मौन के खाली घर मे-                                       ओम आर्य घर लौटता हूँतो तुम्हारी यादें,उसकी बाहों में खो जाती हैवैसे तो मुझे याद हैकि नहीं रहती इस शहर में अब तुमपर फिर भीधडकनों को न जाने क्या शौक हैरुक जाने का अचानक सेऔर दिल भी बहाने बना लेता है कितुम जैसा कोई दिख गया थावो सुबह अक्सर पूछ लेती हैरात को क्यूँ... [पूरी पोस्ट]
writer ओम आर्य
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[29 May 2010 14:01 PM]

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