आना
अपने अतिप्रिय कवि केदारनाथ सिंह की यह कविता इधर अचानक से यों ही याद आई है, वैसे ही जैसे कोई सिनेमाई गीत कभी कभी ज़बान पर अटक जाता है और उसे हम गाहे बे-गाहे गुनगुना लेते हैं। यह कविता मुझे पूरी याद न आकर टुकड़ों में याद आ रही थी पर जब अभी, यहाँ जालन्धर में,...
[पूरी पोस्ट]
चन्दन
12
2
0
2
9
[29 May 2010 13:21 PM]



Shuffle








