आज पूछ्ता हूँ तुमसे...क्या कलम कभी तलवार बनेगी....

दिल की कलम से... जो शोषण का प्रतिकार करे...आगे बढ़ अरि पे वार करे....ले अंगड़ाई तो हिले धारा...कंपन सारा आकाश करे....पान्च्जन्य के नाद को सुन...हर ओर अधर्म पे वार करेगी....आज पूछ्ता हूँ तुमसे...क्या कलम कभी तलवार बनेगी....हर एक विभीषण को छान्टे...सब अंग अंग उसके... [पूरी पोस्ट]
writer दिलीप
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[29 May 2010 12:58 PM]

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