सार्थक...अंतिम भाग
फिर उस अनजानी धरती पर प्रधुमन्न का हाथ थामे,मैं बढ़ती ही गयी|कुछ अपने घर के काम और कुछ साहित्यिक जुड़ाव ने मुझे कभी खाली नहीं रखा|शादी के शुरू के तीन साल,ऐसे ही बीत गए और श्रेयसी भी मेरे पास आ गयी|एक छोटी सी गुडिया,जिसकी बहती नाक या एक छींक मुझे परेशान...
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आस्था "देव"
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[29 May 2010 08:44 AM]



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