अजीब विरोधाभास
कीर्ति चौधरी की एक कविता पढ़ें। फिर याद करें, राष्ट्रमंडल खेल के बाबत किए जा रहे विकास कार्यों को। यकीनन, अजीब विरोधाभास पाएंगे।प्रगतिअभी कुछ ही दिन तो बीतेइधर से निकलेकैसा सुनसान था !...और अब ये नए रास्ते हर ओरछज्जों, बालकनियों से उठता हुआ शोरलॉन पर...
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खंभा
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[29 May 2010 06:33 AM]



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