बादल ये मुहब्बत के कहीँ और बरसते हैं.
ग़ज़लबादल ये मुहब्बत के कहीं और बरसते हैं.इक बूँद की खातिर हम वरसों से तरसते हैं.फ़ुरसत नहीं मिलती, मिलने की तुम्हें हमसे,क्या दिल में तुम्हारे है, हम खूब समझते हैं.कदमों की तेरे आहट, फिर हमको सुनाई दे,राहों में जो तन्हा हम, सड़कों पे भटकते हैं.मैं लाख...
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डॉ.सुभाष भदौरिया.
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[29 May 2010 06:09 AM]



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