आदमी की अना

गीत-ग़ज़ल न चाहते हुए भी वो सब दिख जाता है , फिर लफ्जों में उतरना लाजिमी है ... क़द से ऊँची है आदमी की अनाऊँचाई पर भी बौना ही हुआनजर-अन्दाज़ करके करते हैं फनाअन्दाज़ कितना शातिराना हुआउसके मन की उपज , उसका समाँअपना मौसम है जुदा , मेल ही न हुआकिस से पूछे सवाल अपनी... [पूरी पोस्ट]
writer शारदा अरोरा
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[29 May 2010 02:33 AM]

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