बचा रहे आपस का प्रेम

साहित्य सुगंध एक विचार अमूर्त सा कौंधता है भीतर कसमसाता है बीज की तरह हौले हौले अपना सिर उठाती है कविता जैसे फूट रहा हो कोई अंखुआ धरती को भेद कर; तना बनेगा शाखें निकलेंगी पत्तियां प्रकटेंगी एक दिन भरा-पूरा हरा-भरा पेड.बनेगी कविता । कविता पेड. ही तो है इस झुलसाने वाले... [पूरी पोस्ट]
writer madhav

कविता

views
9
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
1
[29 May 2010 01:12 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix