एक प्रेमगीत
देह बांची नित्य मैंने वेदमंत्रों की तरह परउपनिषद के ब्रह्म-सी तुम दूर ही होती रहीं मैं अर्थ की गहराइयों से शब्द की सीमा तलकभटका किया हर रोज लेकिन तुम सदा खोती...
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prkant
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[29 May 2010 01:07 AM]



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