भय और सच
सुबह आँखें मलते सूरज को देखते मैं सच को टटोलती हूँये मैं , मेरे बच्चे और मेरी ज़िन्दगी फिर एक लम्बी सांस लेती हूँसारे सच अपनी जगह हैं अविश्वास नहींएक अनजाना भय कहो इसे हाँ भयउन्हीं आँधियों का जिसने मेरा घरौंदा ही नहीं तोड़ामुझे तिनके-तिनके में बिखराया...
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रश्मि प्रभा...
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[28 May 2010 22:41 PM]



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