सिफर का सफ़र [ग़ज़ल] - श्यामल सुमन
नज़र बे-जुबाँ और जुबाँ बे-नज़र है इशारे समझने का अपना हुनर है सितारों के आगे अलग भी है दुनिया नज़र तो उठाओ उसी की कसर है मुहब्बत की राहों में गिरते, सम्भलते ये जाना कि प्रेमी पे कैसा कहर है अतिरिक्त......
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[28 May 2010 20:30 PM]



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