दुर्जनों का सम्मान
मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि अन्ततः हम लोग चाहते क्या हैं? हम सोचते कुछ हैं, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। हमारे संकटों का कारण कहीं हमारी अस्थिरचित्तता तो नहीं?मेरे कस्बे से प्रकाशित हो रहे साप्ताहिक ‘उपग्रह’ में मैं मेरा स्तम्भ ‘बिना विचारे’...
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विष्णु बैरागी
जीवन का इन्द्रधनुष
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[28 May 2010 16:31 PM]



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