उर की डाली
हा सूखी उर की डाली ! आज गया है रूठ अनोखा इस उपवन का माली ! हा सूखी उर की डाली ! स्वाँस पवन की शीतलता से मिटा न उसका ताप,आशा की किरणें आकर के बढ़ा गयीं संताप, नयन सरोवर लुटकर भी हा कर न सके हरियाली ! हा सूखी उर की डाली ! भाव कुसुम अधखिली कली भी हाय न होने...
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Sadhana Vaid
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[28 May 2010 14:00 PM]



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