"सोचा करता हूँ"
मैं खिड़की पर बैठा अक्सर,बाहर को देखा करता हूँ।अपने जीवन की सच्चाई,पढने की सोचा करता हूँ॥क्षण-भंगुर है जीवन मेरा,एस पल है, उस पल है नहीं,अंतर्मन की में गहराई,छूने की सोचा करता हूँ॥कुदरत ने क्या क्या है बनाया,नभ, धरती और चाँद सितारे,दूर गगन में सूरज...
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Deepak Shukla
kavita
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[13 May 2010 07:27 AM]



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