अपनी परछाई

amitraghat उस रोज़ भीड़ जमा थी रईस-बुर्जुआ-टुच्चे-शातिर सभी तो मना कर रहे थे जेस्चर भी उनका यही दर्शा रहा था; ”उसके जुड़वाँ हुए हैं…….., वह वृक्ष-तल-वासिनी मुक्तिबोध की वही पगली नायिका वहीं अधजले-फिके-कण्डे और राख, नहीं थी अब वह एकाकी, चिपकी जिससे दो नन्ही-नन्ही... [पूरी पोस्ट]
writer Amitraghat
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[28 May 2010 10:26 AM]

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