युद्ध और उबासियां

पहलू पीछे उबासियां थीं और आगे युद्ध थाहमने नदी पार करने की सोची ताकि युद्ध में उतर सकेंअंतहीन चौड़ी लगती थी नदीचांदनी रात में उसकी लहरें ठोस चांदी की तरह चमकती थींलेकिन हमें रोक पाता ऐसा उनमें कुछ भी नहीं थाजैसे-तैसे हमने नदी पार कीफिर एक नजर डोंगियों पर डाली... [पूरी पोस्ट]
writer चंद्रभूषण

कविताएं

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[28 May 2010 10:13 AM]

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