बहुत गर्म दोपहरी है
उन्होंने समेट कर जुल्फे ढीला सा जुडा बनाया है जो इठलाता हुआ गर्दन पे सरक आया है मेरी साँसे उसके खुलने पर ही ठहरी है अब साए को तरसाओ मत बहुत गर्म दोपहरी है...
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Sonal Rastogi
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[28 May 2010 03:46 AM]



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