सेहरा के ज़िस्म पर कोई दरिया उतर गया
सेहरा के ज़िस्म पर कोई दरिया उतर गयाअच्छा हुआ वो आँख मेरी नम जो कर गयारिश्ता मिरा सराब से गहरा रहा बहुत (सराब= मरीचिका) वो भी चला था साथ मेरे मैं जिधर गयामैंने तो कोई आइना तोड़ा नहीं कभीजाने न फिर भी अक़्स मेरा क्यूँ बिखर गयाआदत ही तीरगी की ऐसी है पड़ गई...
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प्रताप नारायण सिंह
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[28 May 2010 02:47 AM]



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