ताकि तराश सकूँ....
लिखता रहाताकि मर ना जाएउन क्षणों की अनुभूतियाँजिन्हें मैंने जियाजिंदा रहे वह मधुरसऔर हलाहलअपनी खुशी सेवक्त के हाथोंजिसे मैंने पियालिखता रहाताकि बने रहेउन ज़ख़्मों के निशांजिन्हें अपने ही हाथोंअकेले में मैंने सियालिखता रहाताकि फूटती रहे कोंपलें[दर्द के...
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डॉ. राजेश नीरव
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[27 May 2010 23:21 PM]



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