...इश्क ऐसा ही सही...
हम जिन पर मर मिटे,उन्होंने कभी जाना भी नहीं,इश्क करना खता है,तो, इसकी ये सजा ही सही...मेहँदी की तरह पिस गए,कितने ही अरमान मेरे,बस यह सोच के खुश हूँ,कि, निखर गए हाथ तेरे...ख़ुशी दो पल की माँगी थी,जन्नत की फरमाइश ना की,थी बहुत दो गज जमीन ही,सारे आसमान की...
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Jayant Chaudhary
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[27 May 2010 22:14 PM]



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