हे आधुनिक कवि!!
हे आधुनिक कवि! जिस पल तुम परेशान होकर ’क्या कविता लिखूँ’ कि उधेड़बुन में अपनी शर्ट की सिवन के साथ खेलते रहते हो… उस एक पल ही, न जाने कितनी कविताओं के पोशाकों की सिवन उधेड़ी जा रही होती है… उस एक पल ही, किसी दुनिया में कविताओं पर थोपी जा रही होती है...
[पूरी पोस्ट]
Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय)
समाज
66
6
0
6
24
[27 May 2010 22:42 PM]



Shuffle








