सिफर का सफ़र
नज़र बे-जुबाँ और जुबाँ बे-नज़र हैइशारे समझने का अपना हुनर हैसितारों के आगे अलग भी है दुनियानज़र तो उठाओ उसी की कसर हैमुहब्बत की राहों में गिरते, सम्भलतेये जाना कि प्रेमी पे कैसा कहर हैजो मंज़िल पे पहुँचे दिखी और मंज़िल।ये जीवन तो लगता सिफर का सफ़र है।।रहम की...
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श्यामल सुमन
कविता
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[27 May 2010 21:55 PM]



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