बनी ना बिगड़ेगी रे
बनी ना बिगड़ेगी रे , कहानी रे मनवानसीबों की मारी रेखिला दिए है फूलों को कांटो में भी हमनेयुगों से भरी है पहली , धरा ने किलकारी रे ||नसीबों की मारी रे ||पीड़ा लेकर खुशियाँ देना कर्जा है जो उसकाकौम के चरणों में रहना सदा ही बलिहारी रे ||नसीबों की मारी रे...
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क्षत्रिय
स्व.श्री तन सिंह जी कलम से
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[27 May 2010 21:58 PM]



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