’हूं...दीज आर फ्रॉम ओल्ड ईरा, विथ द सेम ओल्ड थिंकिंग’।

MERE SAPNE MERE APNE हर दिन की तरह आज भी दौड़ते-भागते मेट्रो में कदम रखा तो भीड़ होने के बावजूद सीट कब्जाने में मैं कामयाब हो गया। बिना वक्त गंवाए मैं रोज की तरह किताब के काले अक्षरों में गुम हो गया। मैं पन्ने दर पन्ने पलट रहा था, और मेट्रो, स्टेशन दर स्टेशन भागी जा रही थी।... [पूरी पोस्ट]
writer Nitish Raj

व्यंग्य

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[27 May 2010 20:32 PM]

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