एकी यात्रा
आवाज़ तन्द्रा और कमजोरी किसी कहानी कविता से नहीं पैदा हुईं थीं उनकी,उनका न संग पता था न थिर-रूप, पता-ठिकाना था भी और नहीं भी था सरे आम में, उल्काएं थीं या थिरकी मुद्राएं शायद परस्पर अनुरोध में या संग्राम में.जिसके पैर भी न देखे थे, आँखें पीछे ही पीछे लगी...
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जोशिम
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[27 May 2010 16:52 PM]



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