जाति पूछ ही रहे तो
जाति पूछने की डिमांड हो रही है सेंसस में। लॉजिक ये दिया जा रहा है कि जब जाति एक हक़ीक़त है और सरकार की नीतियां पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए बन रही हैं तो गिनती तो कर ली जाए पिछड़ी जातियों की। सब समझ रहे हैं कि खेल क्या है। इन पिछड़ी जातियों के वोटबैंक...
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Kishore Ajwani
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[27 May 2010 14:58 PM]



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