रोई आँखें मगर......1.

खामोशी..बहुत कुछ कहती है रोई आँखें मगर.......मई महीनेकी गरमी भरी दोपहर थी। घर से कही बाहर निकलने का तो सवालही नही उठता था। सोचा कुछ दराजें साफ कर लू। कुछ कागजात ठीकसे फाइलोमे रखे जाएं तो मिलनेमे सुविधा होगी। मैं फर्शपे बैठ गई औरअपने टेबल की सबसे निचली दराज़ खोली। एक फाइलपे लेबल... [पूरी पोस्ट]
writer shama

बाबुल

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[31 Mar 2010 14:31 PM]

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