रोयीं आँखें मगर..५(अंतिम)
sansmaran Tuesday, March 10, 2009रोई आँखें मगर.....५ मेरे ब्याह्के कई वर्षों बाद एक बार मैं अपने मायके आई थी कुछ दिनोके लिए। शयनकक्ष से बाहर निकली तो देखा बैठक मे दादाजी के साथ एक सज्जन बैठे हुए थे। दादा ने झट से कहा,"बेटा, इन्हे प्रणाम करो!'मैंने किया...
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shama
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[10 Apr 2010 08:52 AM]



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