भीगती नदी
मैं देख रहा हूँ पता नही कबसे देखता रहूंगा पता नही कबतक इस शाम के अंधेरे में कितना प्रकाश है इस खामोशी में कितना संगीत है सामने निरंतर बहती नदी बारिश में खुलकर नहा रही है वह पत्थर भी भींग रहा है जिसपर बैठा हूँ मैं वो शहर भी भींग रहा होगा जो मेरी पीठ के...
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अभिषेक प्रसाद 'अवि'
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[22 May 2010 11:21 AM]



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