"गुम" ..........."राह"
चलते चलते थक गईराह भी गुम हुईमगर मुझे मंजिल कीछाया भी दिखाई न भी पड़ीहर खुशी मेरी लुट गईफ़िर भी न पलकें नम हुईंजो ख़ुद की आँखों में कैद हैमैं आंसुओं की वो झड़ीजिंदगी में अब कोईअरमान बाकी न रहा जिसके मोती बिखर गएमैं ऐसी सपनों की लड़ी तन्हा चली थी तन्हा...
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Shikha Deepak
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[28 Feb 2009 03:26 AM]



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