ओ पथिक संभलकर जइयो उस देश ------------ अमित शर्मा
ओ पथिक संभलकर जइयो उस देशमहा ठग बैठ्यो है धार ग्वाल को भेषटेढ़ी टेढ़ी चाल चले,अरु चितवन है टेढ़ी बाँकी टेढ़ी हाथ धारी टेढ़ी तान सुनावे बांसुरी बाँकीतन कारो धार्यो अम्बर पीत,अरु गावे मधुर गीतबातन बतरावे मधुर मधुर क्षण माहि बने मन मीतसारो भेद खोल्यो मैं...
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अमित शर्मा
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[27 May 2010 08:34 AM]



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