पुरवाई बहार की !
घूँट-- दर घूँट पीकर दर्द तेरे इंतजार कारफ्ता-रफ्ता देख यूँ ही उम्र गुज़ार दीखुद की हार का ग़म, या तेरी जीत की खुशीहर शाम जिंदगी की मगर, यूँ ही निसार कीकोई आकर पूछेगा तो इतना ही कहेंगे नीरवअबके ये बाज़ी बिना खेले ही हार दीकोई एक ज़ख्म हो तो बताए दिल...
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डॉ. राजेश नीरव
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[27 May 2010 00:38 AM]



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