दिखता नहीं है इक परिन्दा भी कहीं पर आस का ....

काव्य मंजूषा मेरा दिल है इक जज़ीरा इल्म और अहसास का रूह लिए बेरंग शक्ल तेरी आरज़ू की प्यास कादर्द का आसमान कितना ख़ाली ख़ाली लग रहा दिखता नहीं है इक परिन्दा भी कहीं पर आस कातुम हमारी ज़िन्दगी में अब आ ही जाओ मेहरबाँएक अरसा काट डाला हमने तो बनवास का ज़िन्दगी सँवरेगी इक... [पूरी पोस्ट]
writer 'अदा'
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[26 May 2010 18:37 PM]

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