लज्जा के नीड़ में चपलता का बसेरा
अब टिकते नहीं फिसलते हैं मुख पर जाकर मेरे दो दृग. पहले रहती थी नीड़ बना लज्जा, अब रहते चंचल मृग.चुपचाप चहकती थी लज्जा बाहर होती थी चहल-पहल. चख चख चख चख देखा करते कोणों को करके अदल-बदल. अब नहीं रही वैसी सज्जा औ' रही न वैसी ही लाली. बस उछल-उछल घूमा करते...
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Pratul
चंचल मृग
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[26 May 2010 14:51 PM]



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