मुक्तिका: मन का इकतारा.... --संजीव 'सलिल'
: मुक्तिका :मन का इकतारासंजीव 'सलिल' **मन का इकतारा तुम ही तुम कहता है. जैसे नेह नर्मदा में जल बहता है.. *सब में रब या रब में सब को जब देखा. देश धर्म भाषा का अंतर ढहता है.. *जिसको कोई गैर न कोई अपना है.हँस सबको वह, उसको सब जग सहता है..*मेरा बैरी...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
contemporary hindi poetry
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[26 May 2010 14:26 PM]



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