अब चलो नींद के घर
सोयी रात के सिरहाने पर जग रहा था चाँद ।चिंता के हाथों को कसके नींद रखी थी बाँध ।ओढ़ ली है थकी आँखों ने पलकों की चादर ।दफ्तर छोड़ा होश का अब चलो नींद के घर ।अँधेरे ने बेहोशी मेंछेड़ा मन का तार ।दूर सपनों के वादी में बज उठा गिटार ।चित्र साभार गूगल सर्च...
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Indranil Bhattacharjee ........."सैल"
kavita
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[26 May 2010 12:40 PM]



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