इंक़लाब का दीप जलाकर, स्वयं अमर हो जाती कविता....
कभी हृदय मे कुछ भारी सी, दबी दबी रह जाती कविता...कभी उमड़ कर सिसक सिसक कर आँखों से बह जाती कविता...कभी पीठ, माथे पे थपकी, कभी शहद की बूँद सी टपकी...गोदी ले, पुचकार प्यार से, अम्मा सी बन जाती कविता...कभी किसी टूटे ऐनक मे, कभी किसी की झुकी कमर मे...कभी...
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दिलीप
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[26 May 2010 11:03 AM]



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