देखा है भीड़ को
देखा है भीड़ को ढोते हुए अनुशासन का बोझा,उछालते हुए अर्थहीन नारे, लड़ते हुए दूसरों का युद्ध।खोदते हुए अपनी कब्रें, पर .....नहीं सुना .....तोड़ लिया हो कभी किसी भीड़ ने व्यक्ति की अंत:स्चेतना में खिलाअनुभूति का आम्लान पारिजात........
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विनोद बिश्नोई
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[26 May 2010 09:52 AM]



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