ये पुरानी बात है
सब सही था ये पुरानी बात है आज बेकाबू बहुत हालात है ज़िंदगी आघात-दर-आघात है एक पल शह दूसरे पल मात है जातियां तो जिस्म की मज़बूरियाँ रूह की ना पांत है न जात है क्या अमावस पूर्णिमा को खा गयी क्यों भला इतनी अंधेरी रात हैहर कदम पर है सितारों का...
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jogeshwar garg
ghazal
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[26 May 2010 08:55 AM]



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