“आम रसीले मन को भाये” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

नन्हें सुमन सरदी भागी, गरमी आई! पेड़ों पर हरियाली छाई!!  वासन्ती मौसम गदराया! वृक्ष आम का है बौराया!! बागों में कोयलिया बोली! कानों में मिश्री सी घोली!! सूरज पर चढ़ गई जवानी! अच्छा लगता शीतल पानी!! लू के गरम थपेड़े खाकर! आम झूलते हैं पेड़ों पर!! मानसून की बदली... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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[26 May 2010 08:24 AM]

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