यह कविता उस पसीने के बारे में नहीं है ।
उफ़ यह गर्मी , उफ़ यह पसीना ।कहते हैं गर्मी के बारे में सोचने से गर्मी कम नहीं होती और पसीने के बारे में सोचने से पसीना बहना कम नहीं होता ।मैंने भी एक बार पसीने के बारे में सोचने की कोशिश की थी और बन गई एक कविता । अब इसे पढ़कर यह न कहियेगा कि पसीने के बारे...
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शरद कोकास
कविता
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[26 May 2010 07:01 AM]



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