दो विचरने इनको उन्मुक्त आसमां में, इनको करो ना कैद अपने मन के जहाँ में

कुछ इधर से  ,कुछ उधर  से एक मन के बंद कमरे में ना खिडकी थी ना रोशन दान था दरवाजा था ना जाने कब सेबंद पड़ा हुआ   विचार थे घुटे घुटे उन्निंदे सेसोये पड़ेगए थक वो  खड़े खड़े सांकल खुलीमची खलबली  सब रौशनी से नहा गएवो रौशनी जो कभी देखी ना थी सुनी ना थीभगदड़ मची बाहर... [पूरी पोस्ट]
writer दीपक गर्ग
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[26 May 2010 06:02 AM]

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