कितनी क्षुद्र लेखनी मेरी
गिनती के गीत जुटा पायाअपनी आँहों को उर में भरतप कर, जलकर जीवन भर संसृति सागर से गगरी मेंदो-चार बूँद ही भर पायागिनती के गीत जुटा पायाअलबेली मंजिल के दुष्कर पथ परकुछ फूल खिले कुछ काँटे थेइनकी ही गंध चुभन कोअपनी साँसों में भर लायागिनती के गीत सुना...
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डॉ. राजेश नीरव
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[25 May 2010 22:29 PM]



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