अनुगूंज

साहित्य सुगंध समय की रेत के नीचेकहीं गहरेतुम्हारी यादों कीअन्तर्धारा बह रही हैरेगिस्तान मे सरस्वती की तरहअन्तस की उपत्यकाओं मेंबहुत दूरतैर रही हैमधुर अनुगूंजजैसेलौट लौट आता होपहाडों से टकरा करतुम्हारे नाम का अनहद नादउम्र के इस पडाव परहैरान हूं ;पहाड़ वीरान नहीं हुए... [पूरी पोस्ट]
writer madhav

कविता

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[25 May 2010 00:57 AM]

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