ये लज्जा तो केवल संयम
बोलूँ ना बोलूँ ......सोच रही.बोलूँगी क्या फिर सोच रही.मन में बातें ...करने की है इच्छा, लज्जा पर रोक रही. कुछ है मन में थोड़ा-सा भय. संकोच शील में होता लय.पलकों के भीतर छिपे नयन मन में संबोधन का संशय. "प्रिय, नहीं आप मेरे प्रियतम मन में मेरे अब भी है...
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Pratul
संयम
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[25 May 2010 14:48 PM]



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