“600वाँ पुष्प-एक पुरानी रचना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
तन्हाई के आलम में पल-पल, जब उनकी याद सताती है! दिन कट जाता जैसे-तैसे, पर रात बहुत तड़पाती है!! गुलशन से चुराया था जिनको, जुल्फों में सजाया था उनको, दो दिन की जुदाई भी हमसे, अब सहन नही हो पाती है! दिन कट जाता जैसे-तैसे, पर रात बहुत तड़पाती है!! हम...
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
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[25 May 2010 13:11 PM]



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